Saturday, May 8, 2010

ऐसा क्यों है ?





















ऐसा क्यों है ?
मेरी पलकों तक आना एहसान है तुम्हारा,
पर अब तक आँखों में रुका क्यों है ?
गमो से मुझे कोई शिकवा नहीं ,
पर मेरे हिस्से ही दर्द ज्यादा क्यों है ?

जिंदगी तू मुझसे ज्यादा जिए जा रही है ,
और मुझसे किये जा रही है वादे पे वादे ,
पर अब तेरा ही ख़ुदकुशी का इरादा क्यों है ?

सब मिले मुझे यही दास्ताँ लिए हुए ,
अपनी हिम्मत को उन्हें दिखाता हूँ
हर कोई तेरा रास्ता ही बताता क्यों है ?

प्यार रिश्वत जैसी है ,
नज़र आती है सभी आँखों में ,
तो हर सख्श मुझे ही आजमाता क्यों है ?

तेरी बनायीं जन्नत में ,
मुद्दत के बाद खुशियों की आंधी आती है ,
और तभी आंख में कुछ गिर जाता क्यों है ?

रौशनी दिखा कर ख़ुशी देता है पल की,
और अगले ही पल
उसी रौशनी से मेरा घर जलाता क्यों है ?

मुझे अपने पास बुलाता नहीं है
खुदा तुझे तेरा घर इतना प्यारा है ,
तो हर युग में इस दुनिया में आता क्यों है ?

किस्से करू में ये शिकायत ,
" इस ज़माने का और मेरा खुदा तू ही क्यों है " ?
गर है तू ही मेरा खुदा ,
तो मुझे एक बार रुलाता क्यों नहीं है ?
फिर मुझे चुप कराकर ,
अपनी ही गोद में सुलाता क्यों नहीं है ??

" कठोर "



Tuesday, May 4, 2010

ग़लत मैं था अगर , तो सही तुम भी ना थे ....
















ग़लत मैं था अगर , तो सही तुम भी ना थे ....
तुम जी भर के कह गए , हम कह भी ना पाए थे !
जिंदगी तेज चली थी ऐसे ,सदियों का सफर पल में समेट लाये थे !
मेरी हर साँस तेरे नाम लिखी थी ,पर हम साँस ले ना पाए थे !
कहना था बहुत कुछ , पर हम कह भी ना पाए थे !
पतझड़ के मौसम में , सावन के भरोसे छोड़ आए थे !
रूठ गया था सावन हमसे , तो हम आंखों में सावन लाये थे !
आंखों में सावन था मगर , चाह कर भी खो ना पाए थे !!

ग़लत मैं था अगर , तो सही तुम भी ना थे ....


"कठोर"