Sunday, September 26, 2010

चाहता हूँ



चाहता हूँ - तुम्हे सिर्फ अपना तन नहीं ,
मन भी बनाना .....
चाहता हूँ - प्रेम का सिर्फ एहसास भर नहीं ,
उसकी मय भी पिलाना .....
पर मैं हार जाता हूँ , क्युकि तुम्हे पीना पसंद नहीं ,
और मुझे संकीर्ण विचारो से जीना पसंद नहीं !


चाहता हूँ - की तुम मेरी झुकी नजरो से खुद को भी देखो,
पर नज़रे उठा के चलना तुम्हारी फितरत है .....
चाहता हूँ - कौड़ी -कौड़ी कर खुद को बचाना ,
और तुम्हे खरीदना किस्त दर किस्त .......
पर तुम्हे नीलामी पसंद है , ऊँचे दामो वाली !


चाहता हूँ - तुम न पिसो मेरी संकीर्णता से ,
मुझे मेरे क़र्ज़ में भी हसना आता है ....
की कला ...पर तुम्हे कैसे सिखाऊ ??
चाहता हूँ - की तुम मुझे चाहने से स्वतंत्र रहो ,
मेरा हिस्सा न बन पाओ , की भरसक कोशिश करता हूँ ,
पर मेरा स्वाभिमान जो तुम्हारे अन्दर है ....
उससे कैसे अलग करू तुमसे ??


चाहता हूँ - कहना बस एक बात प्रिये ,
की मेरे कुछ - न चाहने में भी ,
तुम्हे चाहना ही है ......


" कठोर "