मैं आज भी अकेला हू , पर "मैं " हू !
शायद ये इस कठोर कवि की नियति है
कठोर बर्फ की तरह जीवन जल मैं पड़ा हू
जो ठंडक तो दे रहा है
पर जल की गर्मी मैं तपन का भी अनुभव कर रहा है !
शायद ये मिटटी का घड़ा पक रहा है !!
डरता हू उनसे नही जो बनावटी है ,
डर है अपने न हुए अपनों से ,
जो घाव देकर मलहम लगाने का दिखावा करते है
दर्द देकर , दर्द का हाल पूछते है !
लगता है फिर एक नया रूप लेकर आए है
पर कही फिर वही रूप ना निकले , सोच के डरता हू !!
मैं कोई लेखक , कलाकार या दार्शनिक नही हू
शब्दों के पीछे छुपा हुआ एक आम इंसान हू
हकीकत मैं जीने वाला .........
दबा हुआ सा , सहमा सा , वक्त को किस्मत ना मानने वाला
कभी कुछ ना कहने वाला ........
तुम मेरी खामोशी को मेरी कमजोरी ना समझ लेना !
मरकर भी खामोश न होगी , " मैं " ऐसी खामोशी हू
बुद्धि की तर्कशक्ति को हटा कर , खामोश होकर देखना !
तब तुम मेरी खामोशी को महसूस कर पाओगे ...
वादा करता हू तुम ख़ुद खामोश हो जाओगे !
जीवन मौन व्रत सा लगेगा , शोकाकुल हो जाओगे !
तभी शायद तुम इस " मैं " को समझ पाओगे !!
ये कैसी लडाई है , ये कैसा दुंद है ?
जानता हू कविता के अंत तक मेरा अंत है !
पर अब तक सिर्फ़ पहली पंक्ति ही लिख पाया हू
तमन्ना है ....
कि इस कविता को पूरी कर दुनिया से रुक्सत हो जाऊ !
जो कह ना पाया इंसान बन अब तक , उसे कवि बन शब्दों मैं कह जाऊ !!
कि " मैं " भी हू ..............
"कठोर "

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